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यह शास्त्र विश्व को शांति, समाज को क्रांति व पठन एवं श्रवण करने वाले को मोक्ष देने वाला है = पंडित हरगोपाल शर्मा

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भाटापारा = कल्याण सागर वार्ड में श्रीमती सम्मत साहू परिवार द्वारा अपने पितरों के मोक्षार्थ व श्रीमती महेश्वरी साहू के वार्षिक श्राद्ध पर आयोजित श्रीमद भागवत महापुराण में कथावाचक भाटापारा निवासी पंडित हरगोपाल शर्मा ने भागवत की महत्ता व भगवान की दिव्य लीलाओं पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि अट्ठारह पुराणों में भागवत महापुराण ही ऐसा है जिसे श्रीमद् शब्द के तिलक से अलंकृत किया गया है । भागवत कथा का श्रवण,मनन एवं चिंतन भक्ति प्रदाता है और इससे आश्रय से धन,पुत्र,वाहन,घर,पत्नी व राज्य प्राप्ति की सभी कामनाओं की पूर्ति हो जाती है यह शास्त्र पठन और श्रवण करने से शीघ्र ही मोक्ष फल देने वाला है ।पंडित हरगोपाल शर्मा ने कथा के माध्यम से बताया कि मनुष्य को अनेक जन्मों के बाद में कहीं भगवान के नामों में भक्ति भाव जागृत होता है कलियुग में प्राणी मात्र के उद्धार का एकमात्र साधन भक्ति ही है अर्थात प्राणी को तप,तीर्थ,योग,यज्ञ आदि में परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं मुक्ति देने में एक मात्र भक्ति ही समर्थ है और इसका प्रमाण ब्रज की गोपियां है, मुक्ति भक्ति की दासी व ज्ञान, वैराग्य उसके पुत्र है और जहां भगवान की कथा होती है वहां भक्ति, ज्ञान व वैराग्य अवश्य पहुंच जाते है ।

यह शास्त्र विश्व को शांति व समाज को क्रांति एवं पठन व श्रवण करने वाले को मोक्ष प्रदान करता है इस लोक में चित्त शुद्धि और पाप के नाश के लिए भागवत से अधिक कल्याणकारी और कोई दूसरा उपाय नहीं है । महाभारत प्रसंग पर उन्होंने कहा कि युद्ध के उपरांत शोक से ग्रसित युधिष्ठिर सहित पांडवों को उपदेश दिलाने हेतु भगवान सभी को सर शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह के पास लेकर गए जहां भीष्म पितामह ने उन्हें राजधर्म व गृहस्थ धर्म का उपदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति को आलसी नहीं होना चाहिए एवं आंखों के आगे पाप होते नहीं देखना चाहिए यह सुंदर द्रौपदी को हंसी आ गई पितामह ने पूछा बेटी तुम हंस रही हो तुम्हारी हंसी का कारण मुझे बतलाओ द्रौपदी ने कहा पितामह आज आप बड़ी ज्ञान की बात कर रहे है उसकी दिन ये आपका ज्ञान कहां गया था जब भरी सभा में दुशासन मेरी साड़ी खींच रहा था तब पितामह ने कहा कि दुर्योधन के दूषित अन्न को खाने से मेरी मति दूषित हो गई थी । पितामह भगवान से कहते है कि प्रभु मुझे अपने पूर्व के एक सौ चौबीस जन्मों के बारे में याद की मैने कभी कोई पाप नहीं किया तो मुझे ऐसी सजा क्यों मिली कि आज चौवन दिनों से मै सर शैय्या पर पड़ा हूं, भगवान ने कहा कि पितामह आपने कोई पाप नहीं किया इसीलिए तो मैं आपके अंतिम वक्त में आपके सामने खड़ा हूं किन्तु आपने कौरवों की सभा में जो पाप होते देखा उसका ही परिणाम है जो आज आपकी ये दशा हुई । शर्मा जी ने सुकदेव व राजा परीक्षित के जन्म की कथा को बड़े विस्तार से सुनाया ऋषभ देव के विषय में बताया कि यह भगवान के आठवें अवतार है जैसे हमारे सनातन धर्म में भगवान के चौबीस अवतार है वैसे ही जैन संस्कृति में चौबीस तीर्थंकर होते है जिनके चरणों के पदार्पण से घर तीर्थ बन जाए उसे ही तीर्थंकर कहते है यही ऋषभ देव जैन धर्म के पहले तीर्थंकर है जो सात द्वीपों की पृथ्वी के सम्राट हुए , कपिलोपख्यान, जड़भरत व अजामिल की कथा प्रसंगों को सुनकर श्रोता भाव विभोर होते रहे ध्रुव चरित्र पर उन्होंने बताया कि जीवन में नारद जी जैसे संतो का सानिध्य प्राप्त हो जाए तो व्यक्ति नर से नारायण के पद को प्राप्त कर सकता है । प्रहलाद चरित्र उन्होंने कहा कि भगवान को भूल जाना ही सबसे बड़ी विपत्ति व भगवान की सदा याद बनी रहना सबसे बड़ी संपत्ति है और भगवान अपने भक्तों के वचनों की मर्यादा रखने हेतु जड़ में भी चैतन्य रूप से प्रकट हो अपने भक्तों की रक्षा करते है जब जब इस धरा धाम में धर्म की हानि होती है तब तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतार लेकर पापियों का नाश कर पुनः धर्म की स्थापना करते है । संगीतमय कथा में श्याम मित्र मंडल के गिरधर महाराज,संजू महाराज,गुड्डू भाई, जित्तू भाई के कथा प्रसंगों पर सुंदर भजनों पर श्रोता झूमते व नाचते रहे कथा श्रवण करने प्रति दिन कथा पंडाल में श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही है ।

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