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ग्राम ठेलका में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा श्रीमद्भागवत कथा में देश भक्ति संगीत की गूंज में श्रीमद्भागवत कथा, श्रद्धालु भक्ति और देशभक्ति के रंग में रंगे

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श्रीमद् भागवत कथा के अंतर्गत आयोजित दिव्य प्रवचन में कथावाचक ने पूतना लीला के माध्यम से संसार और परमात्मा के गूढ़ रहस्य को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि यह संसार तिक्त पान के समान है – इसमें सार भी है और असार भी। अब यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह किसका चयन करता है – संसार का या परमात्मा का।

साध्वी कालिंदी भारती ने कहा कि यदि मनुष्य असार को ही जीवन का आधार बना लेता है, तो अज्ञान, विकार, मोह और माया सदा उसके ऊपर हावी रहते हैं। लेकिन यदि वह ज्ञान को अपनाता है, तो वही ज्ञान उसे पवित्र बनाकर परमात्मा तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

ज्ञान के समान इस संसार में कोई भी वस्तु नहीं है जो मनुष्य को भीतर से शुद्ध कर सके इसीलिए महापुरुष कहते हैं कि सच्चे सतगुरु की शरण में जाकर ही जीवन का सार तत्व प्राप्त होता है। सतगुरु ही वह शक्ति हैं, जो असार में से सार निकालकर भक्त को ईश्वर का साक्षात्कार कराते हैं।

कथा वाचिका कालिंदी भारती ने कमल का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता, क्योंकि उसका नाता सूर्य से होता है वैसे ही मनुष्य संसार में रहते हुए भी परमात्मा से नाता जोड़ ले, तो वह विकारों से अछूता रह सकता है।
पूतना लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि कंस ने भगवान श्रीकृष्ण को मारने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे। कभी पूतना को भेजा, कभी तृणावर्त को लेकिन प्रभु की लीला अपरंपार है। यशोदा मैया रोज लल्ला का श्रृंगार करतीं, गोपियाँ दर्शन के लिए उमड़ पड़तीं, और बाल कृष्ण अपनी बाल लीलाओं से पूरे गोकुल को आनंदित करते रहे।

कथा में यह संदेश दिया गया कि मनुष्य को संसार के असार में उलझने की बजाय सतगुरु रूपी सार को खोजना चाहिए। वही सार उसे ब्रह्म तक पहुंचाता है और जीवन को दिव्य बनाता है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा स्थल पर भक्तिरस, भाव और ज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने कहा कि इस तरह की कथाएँ आज के समय में समाज को सही दिशा देने का कार्य करती हैं।

वृंदावन में बाल लीलाओं से प्रभु श्रीकृष्ण ने दिया जीवन लक्ष्य का संदेश, नामकरण प्रसंग में उमड़ा श्रद्धा भागवत कथा के अंतर्गत आयोजित प्रवचन में कालिंदी भारती ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु अपनी हर लीला के माध्यम से मनुष्य को उसके जीवन लक्ष्य तक पहुँचने की प्रेरणा देते हैं।एक बार गोकुल में महर्षि गर्गाचार्य जी का आगमन हुआ। उस समय नंद बाबा के लाला और रोहिणी जी के पुत्र का नामकरण संस्कार नहीं हुआ था। जैसे ही नंदराय जी को यह ज्ञात हुआ कि गर्गाचार्य जी पधारे हैं, वे उनके पास पहुँचे और विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि आप मेरे दोनों बालकों का नामकरण कर दीजिए।

महर्षि गर्गाचार्य जी ने कहा कि यदि यह बात कंस तक पहुँच गई, तो वह बालकों को क्षति पहुँचा सकता है। इस पर नंद बाबा ने कहा कि वे कोई धूमधाम से नामकरण नहीं करेंगे, बल्कि गुप्त रूप से घर में ही यह संस्कार करवा लेंगे।

गर्गाचार्य जी ने इस प्रस्ताव को उचित बताया और घर में संदेश भिजवाया। उधर रोहिणी जी अपने पुत्र बलराम को लेकर और देवकी-नंदन श्रीकृष्ण को लेकर यशोदा मैया आगे बढ़ीं। जैसे ही वे पहुँचीं, घर का वातावरण आध्यात्मिक भाव से भर गया।

कथा में बताया गया कि गर्गाचार्य जी ने दोनों बालकों का नामकरण करते हुए कहा कि यह बालक अनेकों रंगों में प्रकट होंगे, इसलिए इनका नाम कृष्ण होगा, और रोहिणी जी के पुत्र का नाम बलराम होगा, जो बल और धर्म का प्रतीक हैं।

कथावाचक ने कहा कि प्रभु श्रीकृष्ण की ये बाल लीलाएँ केवल कथा नहीं हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणाएँ हैं। संसार में रहते हुए भी व्यक्ति यदि प्रभु से जुड़ा रहे, तो वह अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी निर्मल रह सकता है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा स्थल पर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने कहा कि ऐसी कथाएँ आज के समय में समाज को संस्कार और लक्ष्य देती हैं।

बसंत पंचमी पर गोकुल बना पीला नगर, लल्ला के दिव्य शृंगार से भावविभोर हुए श्रद्धालु

श्रीमद् भागवत कथा के अंतर्गत आयोजित प्रवचन में बसंत पंचमी के पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का ऐसा भावपूर्ण वर्णन किया कि पूरा कथा पंडाल भक्तिरस में डूब गया।

कालिन्दी ने बताया कि प्रभातकाल होते ही गोकुल के आंगन में फूलों की सुगंध फैल गई। यशोदा मैया ने लल्ला का शृंगार कर दिया। पीले पुष्प, पीले वस्त्र, पीली सजावट — पूरा गोकुल बसंती रंग में रंग गया। बैलों के सींगों तक को पीले रंग से सजाया गया, दुकानों पर पीली मिठाइयाँ बनने लगीं और गोपियाँ पीले घाघरे, ओढ़नियाँ और आभूषण ढूंढने में लग गईं।
प्रातःकाल प्रभु को पीतांबर पहनाया गया, फूलों से बना मुकुट, माला, कंगन और पायल पहनाकर ऐसा दिव्य रूप दिया गया कि मानो कामदेव भी लज्जित हो जाए। नंद बाबा के आंगन में गोपियाँ आरती के थाल लेकर पहुँचीं। पहले सरस्वती पूजन हुआ, फिर गौ पूजन किया गया।

इसके बाद गोकुलवासी सज-धजकर गीत गाते हुए मेले की ओर चल पड़े। वहाँ झूले लगे थे, खिलौनों और मिठाइयों की दुकानें सजी थीं। ढोल की थाप पर बसंत के गीत गूंज उठे आयो महा बसंत, आयो महा बसंत

कन्हैया और सखा झूमते-नाचते रहे, गोपियाँ आनंद में गाती रहीं और पूरा गोकुल बसंतमय हो गया।
कथावाचक ने कहा कि बसंत पंचमी केवल पर्व नहीं, बल्कि जीवन में नवचेतना, ज्ञान और उल्लास का प्रतीक है। प्रभु की लीलाएँ हमें सिखाती हैं कि भक्ति के साथ आनंद और संस्कार भी जीवन का हिस्सा हों।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा स्थल पर भक्ति, रंग, रस और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने कहा कि ऐसा लगा मानो गोकुल स्वयं उतर आया हो।

बसंत पंचमी पर वीरता, बलिदान और राष्ट्रभक्ति का संदेश — पृथ्वीराज से लेकर बिस्मिल तक गूंजा शौर्य का स्वर

श्रीमद् भागवत कथा के अंतर्गत आयोजित प्रवचन में कथावाचक ने बसंत पंचमी के पर्व को केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि वीरता, बलिदान और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी केवल पीले वस्त्र पहनने का पर्व नहीं, बल्कि उस बसंती रंग का स्मरण है जो वीरों के रक्त और त्याग से सना हुआ है।

कालिंदी ने कहा कि बसंत पंचमी के दिन ही पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण विद्या के बल पर मोहम्मद गोरी का अंत किया था। आँखें निकाले जाने के बाद भी पृथ्वीराज ने अपने मित्र द्वारा पढ़ी गई चार पंक्तियों के आधार पर नीचे से लक्ष्य साधकर गोरी को मार गिराया। यह भारत के शौर्य इतिहास का अद्भुत उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी का दूसरा अर्थ है युवावस्था का बसंत। हमारे देश के हजारों युवा कोई 18 वर्ष का, कोई 23 का, कोई 24 का अपने जीवनरूपी बसंत को भारत माता के चरणों में अर्पित कर हँसते-हँसते फांसी के फंदों को चूम गए। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, लक्ष्मीबाई जैसी विभूतियाँ इसी त्याग की प्रतीक हैं।

कथावाचीका ने कहा कि दुख की बात है कि आज वही भारत का युवा नशे और चरित्रहीनता की दलदल में फँसता जा रहा है। स्कूल, कॉलेज, कैंटीन और सिनेमा घरों में फैशन के नाम पर मर्यादाएँ टूट रही हैं। उन्होंने सवाल किया जिन युवाओं पर ब्रिटिश सरकार का इतना अत्याचार था, वे दबाव में नहीं आए, तो आज का युवा दोस्तों के दबाव में क्यों टूट रहा है?

कथा में काकोरी कांड का भी मार्मिक प्रसंग सुनाया गया। बताया गया कि लखनऊ जेल में बंद क्रांतिकारियों ने बसंत पंचमी वहीं मनाई। अंग्रेजों से जब थोड़ी सामग्री मिली तो उसमें बासंती रंग भी था। राम प्रसाद बिस्मिल ने उस रंग में साथियों की टोपियाँ और रुमाल रंगे। सभी ने वह बसंती टोपी पहनकर जेल से निकलते समय गाया मेरा रंग दे बसंती चोल

और यह संदेश दिया कि हम अपना संपूर्ण जीवन भारत माँ के रंग में रंग देना चाहते हैं।

बसंत पंचमी हमें याद दिलाती है कि ज्ञान, शौर्य और त्याग — ये तीनों हमारे जीवन के स्तंभ हैं। यदि आज का युवा इन मूल्यों को अपनाए, तो राष्ट्र फिर से उसी गौरवशाली मार्ग पर लौट सकता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और युवा वर्ग उपस्थित रहा। कथा स्थल पर देशभक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रोताओं ने कहा कि यह प्रवचन केवल कथा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और राष्ट्रचेतना की पुकार था।

छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष स्वामी अखिलेसरानंद के नेतृत्व में यह कार्य किया जा रहा हमुख्य जजमान संतोष साहू – अनिता साहू , परमानंद साहू -खिलेश्वरी साहू गौरव साहू , भार्गव साहू , एसपी रामकृष्ण साहू, अनिल सिंघानिया शिवेन्द्र बिंदल, देवकुमार ताम्रकार, गिरधारी निर्मलकार दिव्य ज्योति जागृति संस्थान परिवार उपस्थित रहे

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