ब्यूरो चीफ अनिल सिंघानिया
थान खम्हरिया। शहर में इन दिनों राजस्थानी गणगौर उत्सव की धूम देखने को मिल रही है। नवविवाहिताओं और कुंवारी कन्याओं ने गणगौर स्वरूप भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर घर पर बनाए गए पवित्र प्रसाद का भोग अर्पित किया।
राजस्थानी लोकगीतों की मधुर धुनों के बीच महिलाओं और कन्याओं ने एकत्रित होकर पहले गणगौर की पूजा की, इसके बाद लोकनृत्य कर उत्सव की खुशियां मनाई। इस दौरान महिलाओं ने गौरी पूजन के पश्चात ईसर-गौर का भेष धारण कर पारंपरिक घूमर नृत्य भी किया।

गणगौर प्रतिमाओं को पानी पिलाने, भोग अर्पित कर बासा देने की परंपरा का भी विधिवत निर्वहन किया गया। पूजन के दौरान महिलाओं ने “पूजो ए पुजारन माता कायर लागू”, “गौर रे गणगौर माता खोल ए किंवाड़ी” जैसे पारंपरिक राजस्थानी गीत गाए। शाम के समय ईसर-गौर की प्रतिमाओं को सिर पर रखकर समूह में गीत गाती हुई बंदोरी भी निकाली गई। परंपरा के अनुसार एक घर में बंदोरी के बाद दूसरे दिन प्रतिमाएं अन्य घरों में ले जाई जाती हैं।
यह गणगौर उत्सव विगत होली पर्व से प्रारंभ हुआ है और लगभग 13 दिनों से घर-घर में बंदोरी की परंपरा निभाई जा रही है। गणगौर पूजन करने वाली कुंवारी कन्याएं और नवविवाहिताएं आपस में मिलकर पूरे उत्साह और उल्लास के साथ पूजा, गीत-संगीत और पारंपरिक कार्यक्रमों में भाग ले रही हैं।
इस अवसर पर शिव प्रीति बिंदल के निवास में भावना बिंदल, नित्या बिंदल, अमित बिंदल, किरण बिंदल के साथ ही मुस्कान सिंघानिया, जागृति अग्रवाल, प्राची अग्रवाल सहित अन्य कन्याओं द्वारा श्रद्धापूर्वक गणगौर पूजन किया गया। शहर के अन्य स्थानों पर भी धूमधाम से गणगौर उत्सव मनाया जा रहा है, जिससे मारवाड़ी समाज एवं अग्रवाल समाज में हर्ष और उत्साह का माहौल बना हुआ है।
गणगौर पूजन के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा माने जाते हैं। इन गीतों में गवरजा और ईसर को बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में संबोधित कर पूजा की जाती है तथा गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम भी लिए जाते हैं। गणगौर पूजन एक महत्वपूर्ण वैवाहिक परंपरा के रूप में भी माना जाता है।
उत्सव के अंतिम दिन शाम को पारंपरिक गणगौर सवारी निकाली जाएगी, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे।




