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सनातन धर्म में मानव सेवा ही सर्वोपरि है

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भाटापारा/ भगवत कृपा भक्ति भाव से आती है। जहां धन का अभिमान हो वहां भक्ति संभव नहीं है। श्री नारायणी नवलधाम में श्रीमदभागवत कथा प्रवचन करते हुए आचार्य श्री झम्मन प्रसाद शास्त्री ने कहा कि
सत्यभामा ने अपने धन अभिमान में श्रीकृष्ण को स्वर्ण से तौलना चाहा। पलड़े में अपने सारे आभूषण सहित समूचा स्वर्ण कोष रख दिया फिर भी तुला तनिक भी नहीं हिली। तभी श्रीकृष्ण के लिए भक्ति भाव लिए रूक्मणि आती हैं और बड़ी श्रद्धा सहित पलड़े पर एक तुलसी पत्र रखती है और तुला संतुलित हो जाती है। भगवत कृपा धन अभिमान से नहीं बल्कि श्रद्धा और विनम्रता से प्राप्त होती है। सत्यभामा को अपने धन के घमंड का अहसास हुआ। तुलसी भगवान् को प्रिय है जहां भगवान भी राजी हो गए। ऐसी पवित्र तुलसी को अपने घर में लगाकर घर को वृन्दावन बनाया जा सकता है। तुलसी जितनी पवित्र है उतना ही हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। सनातन संस्कृति में तुलसी महात्म्य का विश्लेषण किया गया है। आधुनिक काल में तुलसी पर अनुसंधान हो रहें हैं जो अनेक असाध्य रोगों का नाश करती है।
आचार्य ने वर्तमान शिक्षा पद्धति का विश्लेषण करते हुए कहा कि भगवत कथा मानवीय मूल्यों के विकास के लिए है। हम मन से पवित्र हो इसके लिए सत्संग साधन है। हम अपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन करें उनका श्रवण करें। अच्छे विषय पर चर्चा हो।हर मंदिर में ऐसा सत्संग होना चाहिए जिससे सनातन धर्म संस्कृति का ज्ञान मिले, उस पर वार्तालाप हो। लाइब्रेरी में वेद वेदांत, दर्शन का अध्ययन करना जरूरी है ताकि सभी सनातन संस्कृति का स्वाध्याय करें जिससे लोगों के मन में मानव सेवा का भाव जागृत हो सके। मन बुद्धि की एकता के लिए सत्संग करना चाहिए।
आज की शिक्षा को लेकर आचार्य ने कहा कि देश में लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के चलते हम सनातन धर्म, परंपरा से विलग होते जा रहे है। हमारी इस अज्ञानता के कारण धर्मान्तरण हो रहा है। परिवार बिखर रहें हैं, समाज में वैमनस्य पैदा हो रहा है। देश हिंसा बढ़ रही है। अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति से सेवा, त्याग का भाव विलुप्त हो रहा है जो हमारी सनातन संस्कृति का मूलाधार हैं। धन कमाने की होड़ से, परस्पर प्रतिस्पर्धा के कारण प्रेम का अभाव हो चला है। आपस में सुख दुख बांटने की परंपरा ख़त्म हो गई है। हर व्यक्ति अपने को अकेला पाता है और यही परिवार, समाज की अवनति का कारण बनता जा रहा है। सनातन धर्म में सभी मानव बराबर है। मानव सेवा ही सर्वोपरि है इसलिए ही सनातन धर्म में विश्व को एक कुटुम्ब कहा जाता है।

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