भिलाई। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के जाति प्रमाण पत्र के लिए जहां 1950 के रिकॉर्ड को आधार माना जाता है, वहीं इसके बाद के वैध दस्तावेजों के आधार पर भी नगर निकाय की महापौर परिषद से अनुमोदन लेकर प्रमाण पत्र जारी करने का प्रावधान है। लेकिन भिलाई नगर निगम में यही प्रक्रिया अब 89 युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बन गई है।
आवेदकों का आरोप है कि निगम के जिम्मेदार अधिकारी और महापौर परिषद, दोनों ही इस गंभीर विषय पर उदासीन बने हुए हैं। नियमानुसार सामान्य सभा से प्रस्ताव पारित कर एक 10 सदस्यीय टीम गठित की जानी थी, जिसमें निगम अधिकारियों की भी भागीदारी तय थी। टीम के सदस्यों का चयन भी हो चुका था, लेकिन इसके बाद फाइलें जैसे ठंडे बस्ते में डाल दी गईं।

इस मामले में आवेदक पलाश लिहितकर द्वारा उपायुक्त को लिखित आवेदन देकर सलाहकार समिति की बैठक बुलाने की मांग भी की गई, बावजूद इसके अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। सवाल यह उठता है कि जब शासन ने व्यवस्था दी है, तो स्थानीय स्तर पर उसे लागू करने में इतनी बेरुखी क्यों? 4 वर्षों से इस गंभीर विषय पर निर्णय नहीं ले ले पाया महापौर परिषद आखिर क्यों
निगम की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए स्थानीय लोग कहते हैं कि यहां फाइलें चलने से ज्यादा “रोकने” की परंपरा मजबूत है। युवाओं के करियर और नौकरी के सपनों से जुड़ा यह मुद्दा जिम्मेदारों के लिए प्राथमिकता क्यों नहीं बन पा रहा, यह समझ से परे है।
महापौर नीरज पाल के नेतृत्व वाली परिषद से अब तक कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आना भी कई सवाल खड़े करता है। क्या 89 युवाओं का भविष्य यूं ही कागजों में उलझा रहेगा, या फिर निगम प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए जल्द कोई ठोस निर्णय लेगा?
फिलहाल, युवाओं की नजरें शासन और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं—कि उन्हें उनका हक मिलेगा या फिर वादों की फाइलों में ही उनका भविष्य दम तोड़ता रहेगा।




