ब्यूरो चीफ अनिल सिंघानिया
थान खम्हरिया। समीपस्थ ग्राम लोधी कांपा में अपराह्न 2 बजे से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का भक्तिमय आयोजन जारी है। कथा के दूसरे दिन गुरुवार को कथा वाचक गोपाल शरण देवाचार्य ने श्रद्धालुओं को भागवत महापुराण के विभिन्न प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया।
कथा के दौरान उन्होंने भागवत के तृतीय स्कंध के 21वें अध्याय में वर्णित कर्दम ऋषि एवं देवहूति प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि सृष्टि की वृद्धि हेतु ब्रह्मा जी ने कर्दम ऋषि को आदेश दिया था। इसी क्रम में महाराज मनु ने अपनी कन्या देवहूति का विवाह कर्दम ऋषि से कराया, जिनके गर्भ से भगवान कपिल मुनि ने अवतार लिया।
कथा वाचक ने कहा कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले यह अवश्य विचार करना चाहिए कि वहां स्वयं, अपने इष्ट या गुरु का अपमान न हो। यदि ऐसी संभावना हो तो वहां जाने से बचना चाहिए, चाहे वह अपने पिता का घर ही क्यों न हो।

तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने दिया मनचाहा वरदान
कथा में आगे ध्रुव चरित्र का वर्णन करते हुए गोपाल शरण देवाचार्य ने बताया कि राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं—सुनीति एवं सुरुचि। बालक ध्रुव को पिता की गोद में बैठने से रोकने और अपमानित किए जाने के बाद उन्होंने वन जाकर कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और मनचाहा वरदान प्रदान किया।
जड़ भरत की कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
कथा के दौरान जड़ भरत की कथा सुनाते हुए बताया गया कि ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत ने राज्य त्यागकर वनवास ग्रहण किया, किंतु हिरण के प्रति मोह में पड़ गए। इसी कारण उन्हें अगले जन्म में हिरण योनि प्राप्त हुई। बाद में तीसरे जन्म में उन्होंने जड़ भरत के रूप में जन्म लिया। श्रीमद्भागवत पुराण में जड़ भरत के तीन जन्मों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं।




