बंगाल का चुनाव केवल चुनाव नहीं था…. यह प्रश्न था जीवन मरण का…. यह सभ्यता संस्कृति को बचाने की लड़ाई थी…. यह हजारों मासूमों के बहते खून का बदला था.
यह उन हुक्मरानों के दम्भ को तोड़ने की ज़िद थी… जो जनता को मनुष्य समझते ही नहीं थे… जिन्होने माँ माटी मानुष का नारा दे कर इन्ही सभी को नष्ट किया, नोचा खाया.
आज इस युद्ध की जीत का जश्न भी भावुक हो कर मनाया जा रहा है.
Ground पर जो माहौल है… वह वही समझ सकता है… जिसने उस माहौल में जीवन जिया हो.
हम तो दूर बैठे भी भावुक हो रहे हैं.
बंगाल और बंगालियों ने बहुत झेला है…….. यह बदलाव उनके बलिदान की परिणीति है.
नितिन अग्रवाल
सह सयोंजक
व्यापार प्रकोष्ठ
छत्तीसगढ़


