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सौ साल पूरे होने पर उपराष्ट्रपति ने जमकर की आरएसएस की तारीफ, पवित्र गंगा से क्यों की संगठन की तुलना?

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर संगठन की सेवा भावना की तारीफ की। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने समाज के लिए लंबे समय तक काम किया है और इसकी यात्रा पर लिखी गई किताब में इसके कामों का जिक्र है। उपराष्ट्रपति ने संघ की तुलना पवित्र गंगा से क्यों की,

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तुलना पवित्र गंगा से की। उन्होंने कहा कि यह संगठन पिछले 100 वर्षों से दूसरों के कल्याण के लिए बिना किसी स्वार्थ के काम करता आ रहा है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आरएसएस ने एक साधारण शुरुआत से आगे बढ़कर दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में अपनी जगह बनाई है।

उन्होंने यहां उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में आयोजित ‘आरएसएस एट 100: सेवा, एकता और बलिदान की एक सदी’ नाम की किताब के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित किया। राधाकृष्णन ने कहा कि संघ के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर प्रकाशित इस किताब के विमोचन में शामिल होना उनके लिए व्यक्तिगत सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि उनका संघ के साथ लंबे समय से जुड़ाव रहा है।आरएसएस की तुलना गंगा से क्यों की?
आरएसएस पर लिखी गई एक तमिल कविता को याद करते हुए उन्होंने कहा कि संगठन की तुलना अक्सर पवित्र गंगा से की गई है, जो दूसरों के कल्याण के लिए बिना किसी अपेक्षा के बहती रहती है। उन्होंने कहा, संघ पवित्र गंगा की तरह है। जिस तरह गंगा बिना किसी बदले की उम्मीद किए दूसरों के कल्याण के लिए बहती रहती है, उसी तरह आरएसएस ने भी अपनी 100 साल की यात्रा में सेवा की भावना के साथ काम जारी रखा है।

उन्होंने कहा, जिस तरह गंगा एक छोटी धारा के रूप में शुरू होकर एक विशाल नदी बन जाती है, उसी तरह आरएसएस ने भी साधारण शुरुआत की थी और आज यह दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में शामिल हो गया है।

उपराष्ट्रपति ने किताब के लेखक श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने इस किताब में संगठन की भावना और विचारों को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि संघ की यात्रा भारत की सांस्कृतिक जड़ों, विरासत और परंपराओं को फिर से मजबूत करने और आगे बढ़ाने की रही है।

आरएसएस के सिद्धांतों को लेकर क्या कहा?
किताब के शीर्षक का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सेवा, एकता और बलिदान के सिद्धांतों ने आरएसएस की कई पीढ़ियों के स्वयंसेवकों को प्रेरित किया है। उन्होंने कहा, सेवा समाज के प्रति निस्वार्थ समर्पण को दिखाती है, एकता भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से ऊपर उठकर लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करती है। वहीं, बलिदान यह याद दिलाता है कि मजबूत संस्थाएं समर्पण, धैर्य और निस्वार्थ प्रयासों से बनती हैं।

उन्होंने कहा कि संघ की 100वीं वर्षगांठ लाखों स्वयंसेवकों के समर्पण को स्वीकार करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि कोई भी संस्था तभी लंबे समय तक बनी रहती है, जब उसे विश्वास, प्रतिबद्धता और आम लोगों के ऐसे काम से समर्थन मिलता है, जो अपने से बड़े उद्देश्य के लिए काम करते हैं।

पीएम मोदी का जिक्र कर क्या कहा?
किताब के अध्याय ‘प्रधानमंत्री के रूप में एक स्वयंसेवक: मोदी युग’ का जिक्र करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वयंसेवक से ‘प्रधान सेवक’ तक की यात्रा को बताती है। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री ने शासन के केंद्र में लगातार ‘सेवा’ और ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को रखा है। यह आरएसएस की निस्वार्थ सेवा और राष्ट्र निर्माण की सोच को दर्शाता है।

आरएसएस की भूमिका पर और क्या बोले?
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आरएसएस ने भारत की सभ्यता की विरासत, विविध परंपराओं, भाषाओं और आध्यात्मिक विचारों के प्रति गर्व की भावना बढ़ाकर सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि 100 वर्ष पूरे होना केवल संगठन की यात्रा का जश्न मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि इसके स्वयंसेवकों के समर्पण को पहचानने का भी समय है।

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