ब्यूरो चीफ : अनिल सिंघानिया
थानखम्हरिया। हरिशयनी (देवशयनी) एकादशी से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसे संयम, साधना, आत्मचिंतन और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का श्रेष्ठ काल माना जाता है।
पाटेश्वर धाम के ऑनलाइन सत्संग में देवशयनी एकादशी एवं चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए संत श्री रामबालक दास जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास तप, व्रत, दान, जप, सत्संग और आत्मसंयम का सर्वोत्तम समय है। उन्होंने कहा कि यह भगवान के विश्राम का नहीं, बल्कि योगनिद्रा का काल है, जिसमें सृष्टि का सूक्ष्म संचालन आध्यात्मिक रूप से होता है।
उन्होंने बताया कि देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर चार माह तक चलने वाला चातुर्मास भारतीय जीवन पद्धति का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप प्रस्तुत करता है। वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा, अनावश्यक भ्रमण से बचने तथा मन को ईश्वर की साधना की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से ऋषि-मुनियों ने इस अवधि को विशेष महत्व दिया है। इसी दौरान साधु-संत एक स्थान पर रहकर धार्मिक प्रवचन देते हैं तथा समाज को नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं।
संत रामबालक दास ने कहा कि चातुर्मास में विवाह, गृहप्रवेश एवं अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं। इस अवधि में कथा, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन, सत्संग और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष आयोजन किया जाता है। वर्षा ऋतु में संक्रमण की संभावना अधिक रहने से उपवास एवं सात्विक भोजन शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। इससे पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। संयमित जीवनशैली अपनाना और अनावश्यक यात्राओं से बचना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास मनुष्य को बाहरी भाग-दौड़ से हटकर आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। यह संदेश देता है कि जीवन में केवल भौतिक उन्नति ही पर्याप्त नहीं, बल्कि मानसिक शांति, नैतिक मूल्यों का पालन और आध्यात्मिक विकास भी उतना ही आवश्यक है।
संत श्री रामबालक दास ने प्रकृति संरक्षण पर भी विशेष बल देते हुए कहा कि इस अवधि में वृक्षारोपण, जल संरक्षण एवं जीव-जंतुओं की रक्षा का विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को ईश्वर का स्वरूप मानकर उसकी रक्षा का संदेश दिया है। भगवान विष्णु की योगनिद्रा हमें आत्मविश्लेषण, संयम और साधना का महत्व सिखाती है। यह काल परमार्थ, प्रकृति संरक्षण और नई सृष्टि के निर्माण हेतु एकांत साधना का समय है।
उन्होंने पौराणिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए वचन की पालना हेतु भी चार माह तक सुतल लोक में निवास करते हैं। वर्षा ऋतु में सूर्य और चंद्रमा का तेज बादलों से आच्छादित हो जाता है तथा पित्त स्वरूप अग्नि की गति मंद पड़ने से शरीर की शक्ति भी शिथिल हो जाती है। इसलिए चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ स्वास्थ्य संरक्षण का भी श्रेष्ठ अवसर माना गया है।




