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11 माह बाद भी अधूरी पड़ी 17 करोड़ की सड़क, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवाल

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गंडूवा-खैरझिटीकला-नवागांवकला मार्ग का मामला

29 जुलाई को समाप्त हो चुकी है निर्माण की समय-सीमा, बारिश में कीचड़ और गड्ढों से ग्रामीण परेशान

ब्यूरो चीफ : अनिल सिंघानिया

थान खम्हरिया। सरकारी विकास योजनाओं में समयबद्धता और गुणवत्ता के दावों की जमीनी हकीकत गंडूवा-खैरझिटीकला-नवागांवकला मार्ग पर नजर आ रही है। करीब 17 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली 14 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण 11 माह बीतने के बाद भी पूरा नहीं हो सका है। विभाग और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।

खास बात यह है कि अनुबंध के अनुसार सड़क निर्माण की समय-सीमा 29 जुलाई 2026 को समाप्त हो चुकी है, लेकिन मौके पर अभी भी काम अधूरा पड़ा है। बेमेतरा क्षेत्र को दुर्ग राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ने वाला यह मार्ग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। सड़क बनने से खैरझिटीकला, नवागांवकला, ठर्रकपुर, कांपा, जेवरा, मटिया, टिपनी, गोपालपुर, खाती, पतोरा और सौरी सहित दो दर्जन से अधिक गांवों को बेहतर सीधी कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है। साथ ही बेमेतरा से दुर्ग की दूरी भी कम होने की संभावना है। निर्माण की धीमी रफ्तार के कारण फिलहाल ग्रामीणों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

20 प्रतिशत कम दर पर मिला था ठेका

जानकारी के अनुसार लोक निर्माण विभाग ने सड़क निर्माण के लिए करीब 17 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की थी। निविदा प्रक्रिया के बाद दुर्ग की सुराना एंड कंपनी को निर्धारित एसओआर से करीब 20 प्रतिशत कम दर पर कार्य सौंपा गया था। अनुबंध के अनुसार सड़क निर्माण निर्धारित समय-सीमा में गुणवत्ता के साथ पूरा किया जाना था। इसके बावजूद 11 माह में भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया।

ग्रामीणों के अनुसार कई स्थानों पर मिट्टी भराई का काम अधूरा है। गिट्टी का स्तर भी अपेक्षित मानकों के अनुरूप नहीं होने की बात कही जा रही है। कई हिस्सों में अभी तक बेस लेवल का ही काम दिखाई दे रहा है। विभाग की ओर से निर्माण एजेंसी को नोटिस जारी किए जाने की बात भी सामने आई है, लेकिन इसके बावजूद कार्य की गति में अपेक्षित सुधार नहीं आया है।

बारिश ने बढ़ाई ग्रामीणों की परेशानी

निर्माण की समय-सीमा समाप्त होने के बाद मानसून ने ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। करीब 14 किलोमीटर लंबे मार्ग पर जगह-जगह मिट्टी, कीचड़ और गड्ढों की स्थिति बनी हुई है। इस मार्ग से प्रतिदिन छात्र, किसान, मजदूर और मरीज सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण आवागमन करते हैं। बारिश के दौरान दोपहिया वाहन चालकों को विशेष परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद सड़क की स्थिति कई जगह कच्चे रास्ते जैसी बनी हुई है। ऐसे में निर्माण पूरा होने तक लोगों को आवागमन की समस्या से जूझना पड़ेगा।

अवैध खनन से मुरूम-मिट्टी उपयोग करने का आरोप

सड़क निर्माण को लेकर ग्रामीणों ने निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और उपयोग किए गए मुरूम-मिट्टी के स्रोत पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि निर्माण एजेंसी द्वारा ग्राम पंचायत नवागांवकला की गौचर भूमि से कथित रूप से मुरूम और मिट्टी का खनन कर सड़क के बुनियादी कार्यों में उपयोग किया गया।

ग्रामीणों ने मामले में खनिज विभाग की भूमिका की भी जांच की मांग की है। इसके अलावा निर्माण एजेंसी द्वारा विभाग के समक्ष कथित रूप से संदिग्ध रॉयल्टी बिल प्रस्तुत किए जाने की बातें भी सामने आ रही हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा निर्माण में उपयोग की गई सामग्री और रॉयल्टी दस्तावेजों का सत्यापन कराने की मांग की है।

विभागीय निरीक्षण के बाद भी कार्रवाई पर सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों द्वारा समय-समय पर निर्माण स्थल का निरीक्षण किया गया, लेकिन इसके बावजूद निर्माण एजेंसी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि विभाग को निर्माण कार्य में खामियां दिखाई दे रही थीं, तो समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

अब विभाग के सामने निर्माण एजेंसी को अतिरिक्त समय देने अथवा अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई करते हुए आगे की प्रक्रिया अपनाने का विकल्प है। ग्रामीणों की मांग है कि केवल समय बढ़ाने के बजाय पहले निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री, सड़क की चौड़ाई, जल निकासी व्यवस्था और रॉयल्टी दस्तावेजों की जांच कराई जाए।

जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों में नाराजगी

सड़क निर्माण में देरी को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि सरकार ने क्षेत्र की महत्वपूर्ण सड़क के लिए 17 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की, लेकिन निर्धारित अवधि में काम पूरा नहीं हुआ। बारिश के कारण अब निर्माण कार्य प्रभावित होने की आशंका भी बनी हुई है।

ग्रामीणों का कहना है कि वे नियमित रूप से करों का भुगतान करते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी परेशान होना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद निर्माण कार्य की निगरानी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में लापरवाही बरती जा रही है।

17 करोड़ की सड़क, लेकिन जवाबदेही किसकी?

यह मामला सिर्फ एक सड़क के अधूरे निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग, गुणवत्ता परीक्षण और समय-सीमा के पालन पर भी सवाल खड़ा करता है। जब 17 करोड़ रुपए की लागत वाली 14 किलोमीटर सड़क को निर्धारित समय में पूरा किया जाना था और समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी काम अधूरा है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि सड़क निर्माण की स्वतंत्र गुणवत्ता जांच कराई जाए। निर्माण में उपयोग की गई सामग्री और रॉयल्टी दस्तावेजों का सत्यापन किया जाए तथा यदि किसी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

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