गेड़ी की परंपरा हुई कमजोर, युवाओं ने नारियल फोड़कर मनाया उत्सव
ब्यूरो चीफ अनिल सिंघानिया
थान खम्हरिया। छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व माने जाने वाला हरेली त्योहार नगर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। सावन मास की अमावस्या के अवसर पर मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध प्रकृति, हरियाली, कृषि और किसानों के प्रति सम्मान से जुड़ा हुआ है।
हरेली पर्व पर किसानों ने कृषि कार्य में उपयोग आने वाले हल, कुदाल सहित अन्य कृषि औजारों की साफ-सफाई कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। बच्चों और किसानों में भी पर्व को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। आसपास के गांवों में युवाओं ने नारियल फोड़कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
वहीं, हरेली पर्व की पारंपरिक पहचान मानी जाने वाली गेड़ी की परंपरा इस बार कहीं-कहीं ही नजर आई। बुजुर्गों के अनुसार एक समय था, जब भाटापारा क्षेत्र से लोग गेड़ी पर सवार होकर बस्ती तक आते थे और बच्चे घरों से निकलकर गेड़ी देखने के लिए उत्साहित रहते थे। बदलते समय के साथ यह पारंपरिक संस्कृति अब धीरे-धीरे विलुप्त होती दिखाई दे रही है।

त्योहार के चलते नगर की सड़कें भी अपेक्षाकृत वीरान नजर आईं। अधिकांश व्यापारी वर्ग ने कारोबार से एक दिन का अवकाश लेकर परिवार के साथ समय बिताया। कई लोगों ने पिकनिक स्पॉट और सिनेमा का रुख कर हरेली पर्व का आनंद लिया।
हरेली की परंपरा के तहत यादव समाज के लोगों द्वारा घर-घर जाकर नीम की डंगली और नीम की पत्तियां लगाने की परंपरा भी निभाई गई। लोगों ने इसे सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना से जोड़ा।
इसी कड़ी में श्री रामकृष्ण गौशाला में गोभक्तों द्वारा गायों को आटे की लोंदी और गुड़ खिलाया गया। इस दौरान गौसेवा करते हुए नगर एवं क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की गई।
हरेली पर्व ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, कृषि परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था को जीवंत किया। आधुनिकता के दौर में कमजोर पड़ रही पारंपरिक गेड़ी संस्कृति को सहेजने और नई पीढ़ी को लोकपर्वों से जोड़ने की जरूरत भी इस अवसर पर महसूस की गई।




