आत्मा से परमात्मा का मिलन ही महारास – पंडित हरगोपाल शर्मा
भाटापारा – नेहरू वार्ड में श्याम सोनी रितेश सोनी परिवार द्वारा पितरों के मोक्षार्थ एवं वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में कथा वाचक भाटापारा निवासी पंडित हरगोपाल शर्मा ने भगवान के पावन चरित्रों की कथा को भाव पूर्ण ढंग से सुनाते हुए कहा कि गज व ग्राह की कथा हमे संदेश देती है कि इस संसार में कोई किसी का नहीं सारे संबंध सिर्फ स्वार्थ के है इसलिए व्यक्ति को सदैव भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए ।राम जन्म व कृष्ण जन्म की कथा को बड़े ही सुन्दर ढंग से सुनाते हुए कहा कि सूर्यवंश व चन्द्रवंश की ये विशेषता रही कि सूर्यवंश में सूर्य से लेकर दशरथ तक अधिकांश राजाओं ने यज्ञ किया तभी उनके पुत्र हुआ चंद्रवंश में चंद्रमा से लेकर भगवान द्वारकानाथ व उनके पुत्रों का विवाह राजी से नहीं हुआ उसमें झगड़ा जरूर हुआ ।जब जब इस धरा में पाप की वृद्धि होती है तब तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतरित हो पापियों का नाश कर इस धरा पुनःधर्म की स्थापना करते है ।कृष्ण जन्म पर श्रद्धालु गण नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की व अन्य बधाई गीतों पर झूमते नाचते रहे भगवान के बाल चरित्र पर प्रकाश से डालते हुए कहा पांचो तत्वों में जो अशुद्धि आ गई थी तो भगवान ने माटी खाकर, तृणावर्त व शकटासुर को मारकर ,कालिया का उद्धार कर,अग्नि का पान कर इन पांचों तत्वों को शुद्ध किया था । भगवान ने इंद्र की पूजा बंद करा गोवर्धन पर्वत की पूजा करा हमें संदेश दिया कि हमे वृक्ष,पर्वत,नदियों का संरक्षण करना चाहिए व इनके प्रति देवतुल्य भाव रखना चाहिए । महारास के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि भगवान ने काम को जीतने के लिए ही महारास किया और यह स्त्री और पुरुष का नहीं जीव व जीवात्मा का मिलन था जैसे नन्हा शिशु अपनी ही परछाई से क्रीड़ा करता है वैसे ही भगवान ने गोपियों के साथ दिव्य रास किया गोपियों ने कहा प्रभु संसार में तीन तरह के लोग रहते है पहले जो प्रेम के बदले प्रेम करते है दूसरे वो जो अकारण प्रेम करते है और तीसरे जो किसी से प्रेम नहीं करते तब भगवान ने कहा जो प्रेम के बदले प्रेम व्यवहार ,अकारण प्रेम सिर्फ माता पिता करते है और जो किसी से प्रेम नहीं करते वो आत्माराम, आप्तकाम अकृतग्य और गुरु द्रोही होते है ।उद्धव चरित्र पर पंडित हरगोपाल शर्मा ने कहा बृहस्पति के परम ज्ञानी शिष्य का ज्ञान गोपियों के प्रेमभाव के आगे नतमस्तक हो गया । भगवान के सोलह हजार एक सौ आठ विवाह की कथा को बड़े ही विस्तार से बताया भक्त सुदामा जी के विषय में कहा उनके विषय में शास्त्रों में कुछ और लिखा है और लोग कहते कुछ और है सुदामा जी को कही भी दरिद्र नहीं कहा गया और उन्होंने कहीं भी किसी से भिक्षा नहीं मांगी क्योंकि ब्राह्मण अगर भिक्षा मांगता है तो उसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाता है ब्राह्मण को दान लेने का अधिकार है भिक्षा मांगने का नहीं गरीब होना अलग बात है दरिद्र होना अलग । परम संतोषी, धर्मनिष्ठ सुदामा जी के आगमन का समाचार सुन वही त्रिलोकी का नाथ जिसके पीछे संसार भागता है आज भोजन की थाली छोड़ सुदामा जी के स्वागत हेतु भागे । अंत में उन्होंने बताया जैसे नदियों में गंगा जी श्रेष्ठ है देवताओं में विष्णु जी श्रेष्ठ है वैसे ही पुराणों में भागवत जी श्रेष्ठ है जिसके श्रवण मात्र से जीव समस्त पाप नष्ट हो जाते है और वह परम पवित्र हो जाता है शर्मा जी ने उपस्थित जनसमुदाय से धर्म के साथ ही अपने राष्ट्र के प्रति दायित्वों का निर्वहन करने का आव्हान किया संगीत पक्ष के गिरधर व्यास, संजय शर्मा ,श्रवण एवं रामशरण द्वारा कथा प्रसंगों के सुंदर भजनों पर वातावरण भक्तिमय बना रहा




