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बिना टेंडर के करोड़ों की सामग्री में बंदरबांट: 24 अधीक्षकों पर गिरी गाज, दो लोगों पर पहले ही हुई थी कार्रवाई

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शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार किये जाने का मामला सामने आया है।

शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार किये जाने का मामला सामने आया है। मिलीभगत होने से करोड़ों रुपये में जमकर अनियमितता की गई है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अंतर्गत पोर्टा केबिनों की सप्लाई और भुगतान में ऐसा घोटाला सामने आया है, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जिले के चार विकासखंडों  बीजापुर, भोपालपट्टनम, भैरमगढ़ और उसूर में बनाए गए 26 पोर्टा केबिनों में लगभग एक करोड़ 20 लाख रुपए से अधिक का भुगतान बिना किसी भंडार क्रय नियम या टेंडर प्रक्रिया का पालन किए बिना ही कर दिया गया।

एसडीएम के जांच के बाद खुली  पोल
एसडीएम स्तर पर हुई शुरुआती जांच में बीजापुर और भोपालपट्टनम अनुभाग के 11 पोर्टा केबिनों में फर्जी भुगतान के दस्तावेजी प्रमाण सामने आए। इसके बाद कलेक्टर ने भैरमगढ़ और उसूर ब्लॉकों की भी जांच करवाई, जहां भुगतान प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं।

प्रशासन की सख्ती: अधीक्षक पद से हटाए गए
जांच रिपोर्ट के बाद कलेक्टर ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चारों ब्लॉकों के 24 अधीक्षकों को पद से हटा दिया है और उनके स्थान पर नए अधीक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है। साथ ही अब इन अधीक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है।

अब तक दो कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज
प्रशासन की शुरुआती कार्रवाई में दो कर्मचारियों पर पहले ही एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। संकेत साफ हैं कि यह कार्रवाई आगे और बढ़ेगी और अधीक्षकों पर भी मामला दर्ज किया जा सकता है।

शिक्षा नहीं, लापरवाही की पोटा बिल्डिंग!
सवाल ये है कि यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के साथ विश्वासघात भी है। पोटा जैसी व्यवस्था उन दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचाने के लिए है, जहां स्थायी भवन संभव नहीं, लेकिन यदि ऐसे मिशनों में भी नियम ताक पर रख टेंडर प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाई गई, तो यह किसके भविष्य से खिलवाड़ है? वही इस पूरे मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा का बजट महज आंकड़ों में नहीं, जमीन पर कितनी पारदर्शिता से खर्च हो रहा है।  इस पर अब निगरानी और जवाबदेही दोनों जरूरी हो गई है।

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