ब्यूरो चीफ रतन कुमार
भिलाई – आईआईटी भिलाई के वैज्ञानिकों ने जल प्रदूषण और औद्योगिक सल्फर कचरे की समस्या से निपटने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है। इस शोध के तहत सल्फर कचरे को जल शुद्धिकरण में प्रभावी उच्च-प्रदर्शन सामग्री में बदला गया है। इस नवाचार को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय साइंस जर्नल ‘एंगवांडे केमी इंटरनेशनल एडिशन’ में प्रकाशित किया गया है।

इस शोध का नेतृत्व भनेन्द्र साहू, सुदीप्त पाल, प्रियंक सिन्हा और डॉ. संजीब बनर्जी ने किया। टीम ने धातु-रहित और पर्यावरण-अनुकूल पॉलिमराइजेशन तकनीक विकसित की है। यह तकनीक कम लागत वाले सल्फर कचरे को सल्फर-डॉट्स (S-dots) में परिवर्तित करती है। ये S-dots हरित फोटोकैटलिस्ट के रूप में कार्य करते हैं, जिनकी सहायता से मल्टी-आर्म स्टार पॉलिमर्स बनाए गए हैं। इन पॉलिमर्स में जल शुद्धिकरण की उन्नत क्षमता है।
औद्योगिक सल्फर कचरे को पर्यावरण हित में बदला
औद्योगिक सल्फर कचरा मुख्य रूप से पेट्रोलियम रिफाइनिंग, कोयला प्रसंस्करण और रासायनिक उद्योगों से उत्पन्न होता है। इसका सुरक्षित निपटान लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। आईआईटी भिलाई की टीम ने इस कचरे को S-dots में बदलकर न केवल कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान किया है, बल्कि इसे पर्यावरण सुरक्षा के एक प्रभावी उपकरण में भी परिवर्तित किया है। नया स्टार पॉलिमर साफ करेगा प्रदूषित जल
विकसित स्टार पॉलिमर नैनो-स्केल की गोलाकार संरचनाएं बनाते हैं। ये संरचनाएं सूक्ष्म स्पंज की तरह कार्य करती हैं और डाई, कीटनाशक, तेल तथा अन्य हानिकारक कार्बनिक अवशेष जैसे हाइड्रोफोबिक प्रदूषकों को अवशोषित कर लेती हैं। परीक्षणों में, इन पॉलिमरों ने 80% से अधिक प्रदूषकों को हटाने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक नदियों, झीलों और औद्योगिक अपशिष्ट जल की सफाई में व्यापक उपयोग की संभावना रखती है।
भारत में जल प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। औद्योगिक इकाइयों, कृषि अपशिष्टों और सीवेज के कारण नदियों तथा भूजल में हानिकारक रसायनों का स्तर बढ़ रहा है। ऐसे में, आईआईटी भिलाई की यह तकनीक ‘जल जीवन मिशन’ और अन्य पर्यावरण पुनर्स्थापन कार्यक्रमों के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान साबित हो सकती है। औद्योगिक कचरे से जल शुद्धि
डॉ. संजीब बनर्जी ने इस तकनीक को “पूर्ण सर्कुलर समाधान” बताया। उन्होंने कहा- हम औद्योगिक कचरे को पहले स्वच्छ उत्प्रेरक (clean catalyst) में बदलते हैं और फिर उसी से ऐसे स्मार्ट पॉलिमर बनाते हैं जो प्रदूषित जल को शुद्ध करते हैं। यह तकनीक पर्यावरणीय समस्याओं को अवसर में बदलने का उदाहरण है।
इस शोध की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरा पॉलिमराइजेशन प्रोसेस हल्की UVA रोशनी में संचालित होता है, जिसमें किसी भी महंगे या विषाक्त धातु की आवश्यकता नहीं पड़ती। धातु-रहित तकनीक होने के कारण यह न केवल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि पूरी तरह से सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल भी है। शोध टीम द्वारा विकसित S-dots आधारित फोटोRDRP तकनीक की खासियत है कि यह पॉलिमराइजेशन को सटीक रूप से नियंत्रित करती है। UVA लाइट को ऑन-ऑफ करके पॉलिमर की ग्रोथ को रोका और फिर शुरू किया जा सकता है। यह क्षमता उन्नत और स्मार्ट पॉलिमर आर्किटेक्चर तैयार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इस तकनीक से तैयार किए गए pH और तापमान-संवेदनशील (dual responsive) पॉलिमर भविष्य में स्मार्ट जल-फ़िल्टरेशन सिस्टम, पर्यावरण-सेंसर और ड्रग डिलीवरी जैसी उन्नत तकनीकों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
IIT भिलाई का यह शोध भारत को स्वच्छ पेयजल और सतत औद्योगिक प्रथाओं की दिशा में बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक बड़े पैमाने पर जल शोधन संयंत्रों और नदी-शुद्धिकरण अभियानों में उपयोग हो सकती है




