उनके निधन से एक सम्पूर्ण कला-युग का दुःखद अंत
सुप्रसिद्ध लोक कलाकार, पंडवानी की पर्याय, पद्मविभूषण से सम्मानित तीजन बाई का लम्बी बीमारी के बाद रायपुर स्थित एम्स हॉस्पिटल में रविवार सुबह दुःखद निधन हो गया। छत्तीसगढ़ सहित देश की सांस्कृतिक राजदूत स्व. तीजन बाई ने देश-दुनिया में प्रदेश की लोक संस्कृति का पिछले कई दशक से प्रभावी ढंग से मंचन व प्रचार-प्रसार किया।
उनके अवसान पर प्रदेश के लोकप्रिय लेखक व संस्कृतिकर्मी आशीष राज सिंघानिया ने अपनी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनसे अपने प्रगाढ़ संबंध व आत्मीयता को याद करते हुए उनके साथ के अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि महाभारत की गाथा को काव्य, कथा व अभिनय रूप में प्रस्तुत की जाने वाली लोककला पंडवानी को स्व. तीजन बाई ने दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया।
पुरुष प्रधान पंडवानी की दो विभिन्न शैलियों वेदमती व कपालिक में से स्व. तीजन बाई ने कपालिक शैली को आत्मसत कर उसकी एक नई परिभाषा गढ़ दी। ये शैली बहुत ही जीवंत और नाटकीय शैली है। इसमें कलाकार खड़ा होकर, पूरे हाव-भाव और अभिनय के साथ अलग-अलग पात्रों को जीवंत कर देता है। ‘कपालिक’ शब्द का अर्थ है कथा का गायक के ‘कपाल’ (स्मृति) में बस जाना। पद्मविभूषण तीजन बाई इस शैली की सबसे प्रसिद्ध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत प्रतिष्ठित कलाकार थी।
श्री सिंघानिया ने बताया कि तीजन अम्मा से उनको दर्जनों बार मुलाक़ात व चर्चा का अवसर प्राप्त हुआ. दो बार स्व. तीजन बाई ने उनकी संस्था के आयोजनों में बतौर अतिथि शिरकत भी की. उनका जाना पूरे देश के लिए एक अनमोल धरोहर को खोने जैसा है, उन्होंने छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में एक सम्मानजनक ढंग से स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई।




