ब्यूरो चीफ : अनिल सिंघानिया
थानखम्हरिया। पाटेश्वरधाम के ऑनलाइन सत्संग में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संत श्री रामबालकदास जी महाराज ने नर्मदेश्वर शिवलिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि लाखों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था के कारण नर्मदा नदी में मिलने वाले गोल एवं चिकने पत्थर स्वयं शिवलिंग का स्वरूप धारण कर लेते हैं। इन्हें ही नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा जाता है।
संत श्री रामबालकदास जी ने बताया कि भारत की पवित्र नदियों में मां नर्मदा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नर्मदा का उद्भव भगवान शिव के पसीने से हुआ है। नर्मदा नदी के तेज बहाव में पत्थर निरंतर एक-दूसरे से टकराते और चारों ओर से घिसते रहते हैं। लाखों वर्षों तक यह प्राकृतिक प्रक्रिया चलने से वे शिवलिंग के समान गोल एवं चिकने आकार में परिवर्तित हो जाते हैं। नदी में बनने वाले भंवर भी इन पत्थरों को शिवलिंग की आकृति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने बताया कि नर्मदेश्वर शिवलिंग लाल, सफेद, पीले, काले सहित विभिन्न रंगों एवं आकर्षक धारियों वाले स्वरूप में प्राप्त होते हैं। ये स्वयं प्राणवान एवं जाग्रत माने जाते हैं, इसलिए इन्हें बिना किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा के सीधे घरों एवं मंदिरों में स्थापित कर पूजा जा सकता है। वहीं यदि नर्मदेश्वर शिवलिंग को तराशा या पॉलिश किया गया हो, तो उसकी विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा कराना आवश्यक होता है।
संत श्री रामबालकदास जी ने कहा कि भगवान शिव ने मां नर्मदा को यह दिव्य वरदान दिया है कि “तुम्हारा कंकर-कंकर शंकर के रूप में पूजित होगा।” यही कारण है कि नर्मदेश्वर शिवलिंग का सनातन धर्म में अत्यंत विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।




