ब्यूरो चीफ अनिल सिंघानिया
थान खमरिया। नगर की सड़कों और बाजारों में खुलेआम घूमते एवं बीच सड़क पर बैठे मवेशी राहगीरों के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। सूखी और सुरक्षित जगह तलाशने के चक्कर में बड़ी संख्या में गायों के झुंड सड़कों पर डेरा जमा लेते हैं। इससे यातायात प्रभावित होने के साथ-साथ दुर्घटनाओं का खतरा भी लगातार बना रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार बदल गई, लेकिन नगर में खुले मवेशियों की समस्या और व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
सड़कों पर मवेशियों का बैठना और बाजारों में उनका घूमना नगर एवं आसपास के क्षेत्र के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। कई बार गायों और अन्य मवेशियों के सड़क के बीचों-बीच बैठ जाने से वाहनों की आवाजाही बाधित होती है और जाम की स्थिति निर्मित हो जाती है। रात के समय सड़क पर बैठे मवेशी वाहन चालकों को दिखाई नहीं देने के कारण दुर्घटनाओं की आशंका और बढ़ जाती है। इस समस्या के चलते कई बार हादसे भी हो चुके हैं।

दूध देना बंद किया तो खुला छोड़ देते हैं पशुपालक
स्थानीय लोगों के अनुसार कई पशुपालक गायों के दूध देना बंद करने के बाद उन्हें खुला छोड़ देते हैं। इसके बाद इन मवेशियों के लिए न तो पर्याप्त चारे की व्यवस्था होती है और न ही रहने के लिए सुरक्षित स्थान। परिणामस्वरूप गायें भोजन और सूखी जगह की तलाश में बाजारों और मुख्य सड़कों पर भटकती रहती हैं।
वहीं दूसरी ओर गोठान भी अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहे हैं। कई स्थानों पर गोठान की भूमि पर अतिक्रमण होने तथा पर्याप्त व्यवस्था एवं चरवाहे की कमी के कारण मवेशियों को सुरक्षित रखने में परेशानी हो रही है। इससे खुले में घूमने वाले मवेशियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
शिकायतों के बाद भी नहीं निकला समाधान
नगरवासियों का कहना है कि इस समस्या को लेकर जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभाग के अधिकारियों से कई बार शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण आम लोगों, दोपहिया वाहन चालकों और स्कूली बच्चों को विशेष परेशानी का सामना करना पड़ता है।
लोगों का कहना है कि पशुपालन करने वाले लोगों को अपने पशुओं के रहने और चारे की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। केवल गाय पाल लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी भी पशुपालक की होनी चाहिए। सबसे अधिक परेशानी उन गायों को होती है, जो दूध देना बंद कर देती हैं और जिन्हें पशुपालक खुले में छोड़ देते हैं।
गोवंश की दुर्दशा पर गोभक्तों में आक्रोश
भारत में गाय को माता का दर्जा दिया गया है और संत-महात्माओं तथा विभिन्न संगठनों द्वारा गोवंश संरक्षण एवं गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने को लेकर अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में गोवंश की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
हाल ही में ग्राम खंडसरा एवं हेमाबंद में गोवंशों की दर्दनाक मौत की घटनाओं को लेकर गोभक्तों एवं ग्रामीणों में आक्रोश देखने को मिला था। लोगों का आरोप है कि इन घटनाओं के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है। वहीं नगर क्षेत्र में भी कुछ गायों की मौत की सूचना सामने आने के बाद गोवंशों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
गोधन योजना का उद्देश्य अच्छा, मॉनिटरिंग पर उठे सवाल
पशुधन विकास विभाग के सदस्य अनिल सिंघानिया ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बेसहारा, घुमंतू और निराश्रित गोवंश के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए गोधन योजना तथा गोठानों का संचालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संबंधित विभाग के अधिकारियों की मॉनिटरिंग सही ढंग से नहीं होने के कारण योजना का अपेक्षित लाभ जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।
उन्होंने बताया कि पशुधन विकास विभाग द्वारा यह व्यवस्था विशेष रूप से तस्करी एवं अवैध परिवहन में पकड़े गए पशुओं तथा घुमंतू और बेसहारा पशुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। लेकिन देखरेख और उचित मॉनिटरिंग के अभाव में गोठान व्यवस्था की स्थिति दयनीय होती जा रही है। इसमें सुधार किए जाने की आवश्यकता है, तभी गोवंश का वास्तविक संरक्षण एवं संवर्धन संभव हो सकेगा।
गौ सेवा आयोग से ठोस कार्रवाई की मांग
नगरवासियों एवं गोभक्तों ने गौ सेवा आयोग से मामले को संज्ञान में लेकर आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि केवल सड़क से मवेशियों को हटाना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करने के साथ गोठानों की व्यवस्था सुधारना, अतिक्रमण हटाना, चारे और पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना तथा जरूरत पड़ने पर निराश्रित मवेशियों के लिए सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था करना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में गोवंश की दुर्दशा और खुले में छोड़े गए पशुओं की समस्या के पीछे पशुपालकों की उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और प्रभावी प्रबंधन की कमी प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग और स्थानीय प्रशासन समस्या को गंभीरता से लेते हुए ठोस एवं स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करें, ताकि सड़कों पर मवेशियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर रोक लग सके और गोवंश को भी सुरक्षित आश्रय मिल सके।




