डॉ. हेडगेवार एवं पूजनीय श्रीगुरुजी के जीवन से कार्यकर्ताओं को मिली संगठन साधना की प्रेरणा
*जय श्रीराम*
विश्व हिन्दू परिषद, छत्तीसगढ़ प्रांत द्वारा आयोजित *परिषद शिक्षा वर्ग* का आयोजन *05 जून से 15 जून 2026* तक *अग्रसेन भवन, भिलाई-दुर्ग* में सम्पन्न हुआ। वर्ग में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए दायित्ववान कार्यकर्ताओं ने सहभागिता कर संगठन, सेवा, सुरक्षा, संस्कार एवं समाज जीवन के विविध आयामों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया।
वर्ग के दौरान *विश्व हिन्दू परिषद मध्य क्षेत्र के क्षेत्र संगठन मंत्री आदरणीय श्री जितेन्द्रजी पवार* का अत्यंत प्रेरणादायी एवं चिंतनपरक उद्बोधन प्राप्त हुआ। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय *डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार* तथा द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय *श्रीगुरुजी माधव सदाशिवराव गोलवलकर* के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कार्यकर्ताओं को संगठन जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंगों से अवगत कराया।
उन्होंने कहा कि संगठन का कार्य केवल किसी संस्था का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्र जीवन के पुनर्निर्माण की सतत साधना है। डॉ. हेडगेवार एवं श्रीगुरुजी का सम्पूर्ण जीवन त्याग, समर्पण, अनुशासन, संगठन शक्ति और राष्ट्रभक्ति का सजीव उदाहरण है।
## बाल्यकाल से राष्ट्रभक्ति और संवेदनशीलता
श्री पवार ने बताया कि बालक माधव (श्रीगुरुजी) के मन में बचपन से ही मातृभूमि के प्रति गहरी श्रद्धा थी। एक बार वे मिट्टी खोद रहे थे, तब उनकी माताजी ने कहा कि यह धरती हमारी माता है, इसे भी कष्ट होता होगा। यह बात उनके हृदय में इतनी गहराई से बैठ गई कि उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपनी मातृभूमि को कभी कष्ट नहीं पहुँचने देंगे।
उन्होंने एक अन्य प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1940 में डॉ. हेडगेवार के देहावसान के पश्चात जब डॉ. आबाजी थत्ते से किसी ने कहा कि वे तो डॉ. साहब के दाहिने हाथ थे, तब उन्होंने उत्तर दिया—“हाँ, मैं उनका दाहिना हाथ था, परन्तु श्रीगुरुजी डॉ. साहब का हृदय थे।” यह कथन दोनों महापुरुषों के आत्मीय संबंधों का परिचायक है।
## संगठन की अभेद्य शक्ति
श्रीगुरुजी के एक प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए श्री पवार ने कहा कि—
“डॉ. जी ने मत-मतांतरों के कोलाहल में विलीन हो जाने वाला कोई पिलपिला संगठन हमारे हाथों में नहीं सौंपा है। हमारा संगठन एक अभेद्य किला है। इस पर चंचु प्रहार करने वालों की चोंचें टूट जाएँगी।”
यह कथन संगठन की शक्ति, आत्मविश्वास और दृढ़ता का प्रतीक है।
## श्रीगुरुजी का जीवन प्रवास
श्री पवार ने बताया कि श्रीगुरुजी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और 1931 से 1933 तक वहाँ अध्यापन कार्य किया। इसी काल में भैयाजी दाणी के माध्यम से उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचय हुआ। वर्ष 1932 में उन्हें नागपुर विजयादशमी उत्सव में आमंत्रित किया गया, जहाँ वे डॉ. हेडगेवार के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुए।
1934 में वे नागपुर शाखा के कार्यवाह बने तथा अकोला संघ शिक्षा वर्ग में सर्वाधिकारी के रूप में दायित्व निभाया। इसी दौरान उनका रामकृष्ण मिशन और स्वामी अखण्डानन्द जी से संपर्क हुआ। 1935 में उन्होंने एल.एल.बी. की शिक्षा पूर्ण की तथा 1936 में सरगाछी आश्रम जाकर स्वामी अखण्डानन्द जी की सेवा में रहे।

13 जनवरी 1937 को उन्हें दीक्षा प्राप्त हुई। दीक्षा के समय स्वामी अखण्डानन्द जी ने कहा—
“अपने सारे गुण तुझे देता हूँ और तेरे सारे अवगुण मैं लेता हूँ।”
यह घटना उनके जीवन की आध्यात्मिक दिशा को और अधिक स्पष्ट करने वाली सिद्ध हुई।
1938 में उन्होंने अपनी माताजी की अनुमति से संघ कार्य को ही जीवन कार्य के रूप में स्वीकार कर लिया। 1939 में उन्हें कोलकाता भेजा गया, जहाँ उन्होंने एक माह तक पैदल भ्रमण कर संगठन कार्य को गति प्रदान की। 13 अगस्त 1939 को वे सरकार्यवाह बने तथा मात्र दस माह बाद संघ के द्वितीय सरसंघचालक का दायित्व संभाला।
## राष्ट्र संकट के समय नेतृत्व
1946 के डायरेक्ट एक्शन के समय श्रीगुरुजी ने निरंतर प्रवास कर हिन्दू समाज का मनोबल बढ़ाया। देश विभाजन की विभीषिका के समय उन्होंने प्रत्येक हिन्दू को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने का आह्वान किया।
1947 में मुंबई में एक लाख स्वयंसेवकों का विशाल सम्मेलन आयोजित होना था, किंतु सरकारी प्रतिबंधों के कारण इसे चार स्थानों पर सम्पन्न करना पड़ा। यह संगठन की कार्यक्षमता और अनुशासन का अनुपम उदाहरण था।
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