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जब तक साधक भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को नहीं मिटाता, तब तक उसका कल्याण नहीं होता — आचार्य सुमित भारद्वाज

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ब्यूरो चीफ अनिल सिंघानिया

थानखमरिया। सावन मास के पावन अवसर पर स्थानीय रामजी लाल जगदीश प्रसाद भवन में मातृशक्ति महिला मंडल के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में मानस मर्मज्ञ एवं भागवताचार्य आचार्य सुमित भारद्वाज ने श्रद्धालुओं को पाखंड, दैवी एवं आसुरी संपदाओं के विषय में विस्तार से बताया।

आचार्य सुमित भारद्वाज ने कहा कि पाखंड का अर्थ दिखावा, छल-कपट और आडंबर है। जब व्यक्ति मन, वचन और कर्म से कुछ और होता है, लेकिन समाज के सामने अपने अच्छे गुण, धर्म और नैतिकता का झूठा प्रदर्शन करता है, तो उसे पाखंड कहा जाता है। सरल शब्दों में कथनी और करनी में अंतर ही पाखंड है।

उन्होंने दैवी और आसुरी संपदाओं का वर्णन करते हुए कहा कि शास्त्रों में दैवी संपदा के 26 गुण बताए गए हैं, जबकि आसुरी संपदा के प्रमुख छह दोष बताए गए हैं। आसुरी प्रवृत्तियां कम होने के बावजूद दैवी गुणों पर भारी पड़ सकती हैं। मनुष्य प्रकृति का पुत्र है और उसके भीतर दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां मौजूद रहती हैं। यदि मनुष्य दैवी संपदाओं की ओर आगे बढ़ता है तो संस्कृति की ओर जाता है, जबकि आसुरी संपदाओं की ओर बढ़ने पर विकृति की ओर अग्रसर होता है।

आचार्य ने कहा कि मनुष्य का जीवन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। ईश्वर ने मनुष्य को अच्छे और बुरे में अंतर समझने तथा सही मार्ग चुनने की बुद्धि भी प्रदान की है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के भीतर अनेक अच्छे गुण होने के बावजूद यदि कोई एक आसुरी प्रवृत्ति हावी हो जाए तो वह उसके जीवन की नैया को भवसागर में डुबो सकती है। इसलिए साधक को अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। जब तक साधक अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को नहीं मिटाता, तब तक उसका वास्तविक कल्याण संभव नहीं है।

कथा के पश्चात श्रद्धालुओं ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पूजा-अर्चना और आरती की। इसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया। कथा में बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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