थानखम्हरिया। स्थानीय रामचंद्र-सागरमल धर्मशाला में वार्ड क्रमांक 2 एवं 3 के नगरवासियों के सहयोग से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन राजा परीक्षित के जन्म, शुकदेव जी के अवतरण तथा उनके राजा परीक्षित से मिलन के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक एवं ज्ञानवर्धक वर्णन किया गया। कथा का श्रवण कर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
कथावाचक पंडित नारायण दुबे जी महाराज ने बताया कि महाभारत युद्ध के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोधवश पांडव वंश का नाश करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उस समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा गर्भवती थीं। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से गर्भस्थ शिशु की रक्षा हुई और उसी बालक का जन्म राजा परीक्षित के रूप में हुआ।
महाराज श्री ने आगे बताया कि राजा परीक्षित एक धर्मनिष्ठ एवं प्रजावत्सल शासक थे। एक बार वन भ्रमण के दौरान वे ऋषि शमीक के आश्रम पहुंचे। ऋषि ध्यान में लीन थे, इसलिए उन्होंने राजा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। इसे अपना अपमान समझकर राजा परीक्षित ने मृत सर्प उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को इस घटना का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के दंश से उनकी मृत्यु हो जाएगी।

श्राप की जानकारी मिलने पर राजा परीक्षित ने सांसारिक मोह त्यागकर विद्वानों एवं ऋषियों का सान्निध्य ग्रहण किया। इसी दौरान परम ज्ञानी शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ और उन्होंने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य ज्ञान प्रदान किया। कथावाचक ने भागवत महात्म्य पर भी विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत का श्रवण मनुष्य को मोक्ष का मार्ग दिखाता है।
कथा विश्राम के पश्चात मुख्य यजमान राजेश ठाकुर ने व्यासपीठ की आरती उतारकर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर पुखराज सिंह, प्रमोद सिंघानिया, गिरीश शर्मा, नयन ठाकुर, राज शर्मा, दिलीप ठाकुर, गोपाल अग्रवाल, विपिन शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं महिलाएं उपस्थित रहीं।




